राजद-भाजपा के बीच संबंध, तेजस्वी हो सकते हैं बिहार के अगले सीएम, BJP देगी समर्थन!


बिहार की राजनीति में बहुत जल्द एक बड़ा बदलाव दिखने को मिल सकती है। जानकारों की माने तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और राजद एक साथ गठबंधन कर विधान सभा चुनाव में उतर सकती है। संभव है तेजस्वी को अगला सीएम प्रोजेक्ट किया जा सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस और जदयू अन्य शेष दलों के साथ गठबंधन करें।

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मोदी कैबिनेट में जदयू को उचित सम्मान नहीं मिलने के बाद से बिहार में अप्रत्याशित ढ़ंग से राजनीतिक बदलाव दिखने को मिल रहे है। अपने पराए बन रहे हैं तो पराए हितैषी होने का दिखावा कर रहे हैं। आज हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भी कई प्रश्नों को जन्म दे दिया है। नौ नए मंत्रियों में से भाजपा को एक भी ना देना। लोजपा कोटे की मंत्री पद पर जदयू के नेता का चयन होना कहीं सांकेतिक रूप से भाजपा को नीतीश का जवाब तो नहीं है।

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नीतीश और भाजपा में जहां दूरियां बनती दिख रही हैं वहीं कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता सीएम नीतीश कुमार के समर्थन में खुलकर बोल रहे हैं। कारण भले जो हो लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि आने वाले दिनों बहुत कुछ राजनीतिक बदलाव दिखाने को मिल सकती है। इस बीच एक खबर यह भी है कि भाजपा और राजद ने एक दूसरे को इफ्तार पार्टी में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण भेजा है।

 

 

नीतीश जहां एक ओर इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि भाजपा के प्रेशर पॉलिटिक्स का जमकर जवाब दिया जाय वहीं भाजपा भी कमर कस चुकी है कि मौका मिलने पर नीतीश को पटखनी दी जा सके। राजद के एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना छापे जाने के शर्त पर बताया कि लोक सभा चुनाव परिणाम के बाद राजद जान चुकी है कि वह अकेले अपन दम पर विधान सभा चुनाव में सत्ता वापसी नहीं कर सकती है। ऐसा में वह सिद्धांत के विपरित जाकर भाजपा के साथ हाथ मिला सकती है। संभव है कि तेजस्वी सीएम पद भाजपा को देने के लिए तैयार भी हो जाए। कारण राजद का एक मात्र उद्देश्य यह है कि राजद सप्रीमो को जेल से बाहर निकाला जाय। एक प्रश्न के जवाब में राजद नेता ने कहा कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। जब जम्मू कश्मिर में भाजपा धारा 370 का समर्थन करने वाली पार्टी पीडीपी के साथ हाथ मिला सकती है तो राजद के साथ क्यों नहीं।

 

IFTAR PARTY RJD

बताते चले कि नीतीश कुमार का लक्ष्य अब 2020 का विधानसभा चुनाव है। दिल्ली से लौटने के बाद नीतीश कुमार मीडिया से बात कर रहे थे तो उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि बिहार में तपती गर्मी में जिन लोगों ने वोट दिया वे पिछड़ा अतिपिछड़ा वर्ग के लोग थे और गरीब गुरबा के इस वर्ग ने बिहार में जीत दिलाने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में पिछड़ा, अतिपिछड़ा वर्ग की अनदेखी कर बिहार से जो छह मंत्री बनाए गए उसमें चार तो सवर्ण ही थे। ऐसे में नीतीश कुमार ने अपना जो मंत्रिमंडल विस्तार किया, उसमें अधिकतर पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर यह संदेश दे दिया कि जिस वर्ग की केन्द्र में अनदेखी हुई, उस वर्ग के साथ वे खड़े ही हैं। लेकिन साथ ही ब्राह्मण जाति से संजय झा और भूमिहार जाति से नीरज कुमार को भी मंत्री बनाकर यह भी संदेश दिया कि वे सवर्णों के भी साथ हैं।

 

 

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नीतीश कुमार और सुशील मोदी दोनों ने ही एनडीए में किसी तरह के मनमुटाव से इंकार कर भले ही कह दिया कि ऑल इज वेल। लेकिन सुशील मोदी ने यह भी कहा कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल होने के लिए कहा गया था, लेकिन बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने फिलहाल मना किया। ऐसा नहीं था कि बीजेपी से अगर एक दो मंत्री जाते तो बीजेपी में कोई विद्रोह हो जाता। क्योंकि इस प्रचंड जीत के बाद बीजेपी में कोई चूं भी करे, संभव नहीं दिखता। यानि संदेश साफ है कि दिल्ली में अगर जेडीयू ने मना किया तो पटना में बीजेपी ने मना कर दिया। तो फिर एनडीए में ऑल इज वेल कैसे हुआ।


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