कुमार प्रभाकर, राधेश्याम दलानिया, DIG विकास वैभव और ये दिए हुए 2 करोड़, 2 लाख, 1हज़ार रुपए, काश DIG की बात पर Action हो जाता !


अपराधी, फ़्रॉड, 420, और कई नाम हेडलाइन और ख़बर को दमदार बनाने के लिए लगा दिए जाते हैं, और अंत में वो फ़ेमस संजू सीनेमा का फ़ेवरेट डाईलोग उस ख़बर के अंत में एक ? मार्क डाला था आपने ध्यान नही दिया था.

 

पिछले कड़ी में हमने कुमार प्रभाकर और DPRO फ़ाउंडेशन के अंदर कैसे चीज़ें बदली और उगते कम्पनी से एक बदनाम जगह बन गया DPRO फ़ाउंडेशन. कैसे DPRO के नाम पर फ़र्ज़ीवाडा मौजूद कम्पनी के कुछ अधिकारी ही कर बैठे और आस्तीन का साँप की तरह सालों लिपटे भी रहे, लेकिन जब ज़हर ख़ुद को भी प्रभावित करने लगा तो माजरा ही पलट गया.

 

आज की कड़ी में आपको बताएँगे की “काश वक़्त पर अफ़िसर की बात पर ग़ौर हो जाता तो आज एक शहर का व्यवसायी ऐसे बर्बाद नही होता.

श्री राधेश्याम दलानिया ने हनुमंत विहार नाम से अपने कम्पनी के अंतर्गत डाटबाट में प्रोजेक्ट लॉंच किया कुछ वक़्त तो कोशिश किया पर मनमाफ़िक विक्रि न मिल रहा था, इसी बीच कुछ लोगों के मध्यस्थ दलानिया और कुमार प्रभाकर की मुलाक़ात हुई, मुलाक़ात के दौरान बातें बनी और पूरे प्रोजेक्ट को दलानिया ने कुमार प्रभाकर को बेचने का फ़ैसला किया. उसी दौरान दलानिया ने अंतिम बात कहा “हो सके तो प्रोजेक्ट का नाम मत बदलिएगा, काफ़ी सोच के और भावनाओं से ये नाम रखा था” इसी बीच कुमार प्रभाकर का जवाब आया “नाम में क्या ख़राबी हैं ? एक दम बढ़िया नाम हैं, चेंज नही करेंगे, बस आगे कम्पनी का नाम लगा देंगे” चीज़ें आगे बढ़ने लगी.

 

दलानिया ने तय अग्रीमेंट और रेट के तहत 3 भाग में से 2 का रजिस्ट्री कर दिया, इधर DPRO foundation की टीम कुमार प्रभाकर के मार्गदर्शन के अंतर्गत लगातार विक्रि पर पैर ज़माने लगा, विक्रि भी उम्मीद लायक आने लगी. और दोनो भाग में से लगभग प्लॉट ख़त्म होने को था, और इधर अग्रीमेंट भी दलानिया से तीसरे भाग के लिए किया हुआ था, और तीसरे भाग के लिए पैसा भी दलानिया को दिया गया था. बुकिंग का दौर तीसरे भाग पर भी बढ़ा,

 

अब भाग तीन के रजिस्ट्री करने की बारी दलानिया की आयी.

जिस वक़्त ये तीसरे भाग की रजिस्ट्री की बात आयी तो उस वक़्त रजिस्ट्री कार्यालय देर तक काम निपटारे को लेकर खुला रहता था, लगभग 2 करोड़ 2 लाख 1 हज़ार रुपए भी दिए जा चुके थे, सारी काग़ज़ी प्रक्रिया पूरी कर ली गयी थी, गवाहों के साइन भी किए जा चुके थे, बस अब बारी थी फ़ोटो खिचाने की, वो होने ही वाला था की दलानिया ने कुछ काम की बात बोल उस दिन फ़ोटो के वक़्त से ग़ायब हो लिए. मामला यहा से शुरू हुआ. कुछ दिन बाद बात अग्रीमेंट में तय किए गए रेट से ज़्यादा पर रजिस्ट्री के बात पर आ गयी, फिर DPRO के बोर्ड उखाड़े गए, और अब वहा आने वाले ग्राहकों को DPRO को ले -वे माहौल नज़र आने लगा.

 

मामले को लेकर DPRO के तरफ़ से DIG विकास वैभव के कार्यालय में पहुँचा शिकायत.

आपको बता दे की DIG ऑफ़िस में अब इधर बुकिंग के उपरांत रजिस्ट्री ने होने के वजह से DIG विकास वैभव के यहाँ शिकायत लोगों के पहुचने लगे, उसी बीच DPRO के तरफ़ से भी इस बाबत शिकायत दर्ज की गयीं. DIG विकास वैभव ने त्वरित संज्ञान लेते हुए इस मामले में अपने आधिकारियों को जाँच और कार्यवाई करने को भी कहा. पर शायद वक़्त पर या वक़्त के बाद भी इस मामले पर कोई ठोस पहल नही हुआ जिसके उपरांत, बूकिग-रीफ़ंड-रजिस्ट्री ये सब आपस में घूमते और इस बीच में एक फलता फूलता व्यापार आज खो सा गया.

ज़रूरी नही की जो आज कुमार प्रभाकर और DPRO फ़ाउंडेशन के साथ हुआ हैं वो कल आपके साथ ना हो, सिस्टम की उदासीन रवैए से कभी भी कुछ भी हो सकता हैं. ज़रा आँखे बंद कीजिएगा ग़ौर फ़रमाइएगा की कही आप भी उसी रास्ते पर तो नही.

 

अगली कड़ी में ये बताऊँगा: दलानिया आख़िर क्यू पलटे ? कुछ असल और कौन हैं मार्केट में नक़ली कहानी, सब बताऊँगा अगले एपिसोड में इंतेज़ार कीजिए.


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