भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर पर पहुंच गया है। यह एक ऐतिहासिक निम्न स्तर है और इससे देश की अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण असर पड़ रहा है।

जनवरी 2026 में रुपये में 2 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। पिछले साल 2025 में विदेशी निवेशकों की निकासी और मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण रुपये में 5 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी।

आयातकों को क्या नुकसान हो रहा है

कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कोयला, प्लास्टिक, रसायन, सब्जियों का तेल, खाद, मशीनें, सोना और लोहे जैसी चीजों के आयात में लागत बढ़ गई है। भारत को अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत विदेश से आयात करना पड़ता है।

निर्यातकों को कैसा लाभ मिल रहा है

कमजोर रुपये से निर्यातकों को डॉलर में अधिक रुपये मिल रहे हैं। इससे भारतीय उत्पाद विश्व बाजार में सस्ते हो गए हैं। लेकिन जो निर्यातक आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं उन्हें लागत बढ़ने से नुकसान भी हो सकता है।

विदेश जाने वाले छात्रों और सैलानियों पर असर

विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों को अब अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे क्योंकि उन्हें डॉलर में फीस देनी होती है। विदेश जाने वाले सैलानियों को भी विदेशी मुद्रा खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

भारतीय रिजर्व बैंक की कार्रवाई

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 20-21 जनवरी को 2 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा स्वैप का इस्तेमाल किया। इससे रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने और वित्तीय प्रणाली में तरलता बढ़ाने का प्रयास किया गया। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार किसी देश का आंकलन उसकी विनिमय दर से नहीं होना चाहिए।

विदेशी निवेशकों की निकासी

जनवरी 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 3.36 अरब डॉलर की निकासी की है। 2025 में कुल 18.91 अरब डॉलर की निकासी हुई थी। यह निकासी रुपये पर दबाव बना रही है।

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