औरंगाबाद में मातम: जितिया पूजा के बाद नदी में डूबी 13 साल की मासूम

Ghazala Saheb4 October 20262 min read0 viewsBihar
औरंगाबाद में मातम: जितिया पूजा के बाद नदी में डूबी 13 साल की मासूम

बिहार के औरंगाबाद जिले से एक बेहद हृदयविदारक घटना सामने आई है। जितिया पर्व की खुशियां उस वक्त मातम में बदल गईं, जब पूजा के अनुष्ठान के बाद नदी में स्नान करने गई एक 13 साल की बच्ची की डूबने से मौत हो गई। इस हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है।

कैसे हुआ यह दर्दनाक हादसा?

मिली जानकारी के अनुसार, यह घटना रविवार सुबह की है। नवीनगर थाना क्षेत्र के माली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत बैरिया पंचायत के कुलहड़िया गांव के पास पुनपुन नदी के संगम पर यह हादसा हुआ। हर्षिका कुमारी अपने दोस्तों के साथ जितिया की सामग्री विसर्जन करने नदी किनारे गई थी।

बताया जा रहा है कि विसर्जन के बाद जब लड़कियां नदी में नहाने के लिए उतरीं, तो अचानक हर्षिका का पैर एक गहरे गड्ढे में पड़ गया। देखते ही देखते वह गहरे पानी में समा गई। स्थानीय ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए दो अन्य लड़कियों को तो सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन हर्षिका को नदी की तेज लहरें अपने साथ बहा ले गईं।

व्रत की खुशियां बनीं मातम का कारण

हर्षिका के परिवार की स्थिति बेहद दयनीय है। उसके पिता प्रमोद नोनिया बाहर ट्रक चलाते हैं और परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। हर्षिका की मां, पिंकी देवी ने अपने बच्चों की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए जितिया का कठिन व्रत रखा था। उन्होंने पूरी रात निर्जला उपवास किया था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हर्षिका की मौत ने उस मां के अरमानों को पूरी तरह तोड़ दिया है जो अपने बच्चों की सलामती के लिए प्रार्थना कर रही थी।

गांव में पसरा सन्नाटा, मुआवजे की मांग

हादसे के बाद काफी घंटों की मशक्कत और खोजबीन के बाद हर्षिका का शव बरामद किया गया। माली थाने के थानाध्यक्ष संजीत कुमार ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद शव को परिजनों को सौंप दिया गया है।

इस त्रासदी के बाद कुलहड़िया गांव में शोक का माहौल है। गांव के मुखिया प्रतिनिधि उपेंद्र कुमार ने बताया कि:

"परिवार बहुत गरीब है और इस दुखद घटना ने उन्हें तोड़ दिया है। हम जिला प्रशासन से मांग करते हैं कि पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए।"

गांव में इस दुख की घड़ी में एकजुटता का भी संदेश देखने को मिला। ग्रामीणों ने शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए अपने घरों में चूल्हा तक नहीं जलाया। जो गांव कल तक जितिया के गीतों से गूंज रहा था, वहां आज सिर्फ सन्नाटा और आंसू हैं।

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