बिहार में भीषण बाढ़ से पचास लाख लोग प्रभावित, जनता ने व्यक्तिगत दान के बजाय सरकार से मांगी जवाबदेही

बिहार के पंद्रह जिलों में लगभग पचास लाख लोग गंभीर बाढ़ से जूझ रहे हैं। आपदा के इस बड़े पैमाने के बावजूद आलोचकों का कहना है कि पीड़ितों को दान के सहारे की नहीं बल्कि व्यवस्थित सरकारी राहत की जरूरत है, क्योंकि राहत पाना पीड़ितों का मौलिक अधिकार है। मुख्यमंत्री राहत कोष और प्रधानमंत्री राहत कोष में पर्याप्त धन उपलब्ध है। ग्यारह लाख फॉलोअर्स वाले 'अलख सर' और उन्तीस लाख फॉलोअर्स वाली रितु सिंह जैसे सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर्स को नावों पर बैठकर सीमित सामग्री बांटने के वीडियो बनाने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचकों का तर्क है कि आपदा प्रबंधन का यह तरीका पुराना है और पीड़ितों को एहसान पाने वाले के रूप में पेश करके उनके सम्मान को कम करता है। इस साल बिहार में औसत से पैंतीस प्रतिशत कम बारिश हुई, लेकिन नेपाल और अन्य क्षेत्रों से पानी आने के कारण राज्य विनाशकारी बाढ़ का सामना कर रहा है। जानकारों का सुझाव है कि नेपाल की तरह बिहार को भी दान के बजाय जलवायु न्याय की मांग करनी चाहिए, क्योंकि यहां के निवासी स्थानीय लापरवाही के बजाय जलवायु आपदाओं के शिकार हैं। साल दो हजार आठ की कोसी बाढ़ के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बचाव, राहत और पुनर्वास के लिए नीतियां बनाई थीं, जिसमें व्यक्तिगत मदद के बजाय संगठित राज्य कार्रवाई पर जोर दिया गया था। हर साल अप्रैल में होने वाली बाढ़ पूर्व तैयारियों की बैठकों में हजारों करोड़ के बजट के साथ तेरह सूत्री रणनीति शामिल होती है। हालांकि, मौजूदा प्रयासों को अपर्याप्त बताया जा रहा है। वर्तमान में केवल तेरह राहत शिविर चालू हैं और हालांकि बारह सौ अड़तालीस सामुदायिक रसोई हैं, लेकिन उनके प्रबंधन की स्थिति खराब बताई जा रही है। बाढ़ पीड़ितों को बच्चों के लिए दूध, साफ पीने का पानी, मवेशियों के लिए चारा, स्वच्छता सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए, जो सत्तावन प्रभावित पंचायतों में अच्छी तरह प्रबंधित राहत शिविरों के माध्यम से ही मिल सकती हैं। आलोचक इनफ्लुएंसर्स और आम जनता से अपील कर रहे हैं कि वे भावनात्मक सोशल मीडिया अपीलों से ध्यान हटाकर सरकार पर अधिक राहत शिविर खोलने और मौजूदा आपदा प्रबंधन नीतियों को ठीक से लागू करने का दबाव बनाएं। तर्क दिया गया है कि व्यक्तिगत राहत प्रयास पूरे राज्य की सेवा नहीं कर सकते और सरकार को नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।