बिहार में एमएलसी के भाजपा में शामिल होने पर सियासी घमासान, तेजस्वी ने की सदस्यता रद्द करने की मांग
बिहार में दो निर्दलीय एमएलसी के भाजपा के साथ दिखने पर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। तेजस्वी यादव ने उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की है।

बिहार की राजनीति में एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दो नवनिर्वाचित निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों (MLC) के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ जुड़ने की खबरों ने राज्य में सियासी हलचल तेज कर दी है। इस घटनाक्रम के बाद विपक्षी दल हमलावर हैं और उन्होंने इसे संविधान का उल्लंघन करार दिया है।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत 31 अक्टूबर, 2026 को हुई, जब तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय एमएलसी डॉ. राहुल राज पटना में आयोजित एक भाजपा कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान दोनों नेताओं को भाजपा के स्कार्फ पहने हुए देखा गया, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई कि उन्होंने औपचारिक रूप से भाजपा का दामन थाम लिया है।
भाजपा ने दी सफाई: 'सिर्फ समर्थन दिया है'
जैसे ही यह मामला गरमाया, भाजपा के प्रवक्ताओं ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण और विधायक मनोज शर्मा ने स्पष्ट किया कि इन एमएलसी ने आधिकारिक तौर पर पार्टी की सदस्यता नहीं ली है। उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जेडी(यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार को अपना समर्थन देने का निर्णय लिया है।
तेजस्वी यादव का बड़ा हमला: सदस्यता रद्द करने की मांग
विपक्ष ने इस मामले को लेकर सरकार और भाजपा को आड़े हाथों लिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों एमएलसी की सदस्यता रद्द करने की औपचारिक मांग की है। तेजस्वी यादव ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि:
- संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के तहत, यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
- अनुच्छेद 191(2) के अनुसार, जो व्यक्ति दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित होता है, वह राज्य विधानमंडल का सदस्य बने रहने के लिए भी पात्र नहीं रहता।
आरजेडी के अन्य दिग्गज नेताओं, जिनमें मनोज झा भी शामिल हैं, ने इस घटना को 'संविधान का मजाक' बताया है।
"यदि विधान परिषद के सभापति दसवीं अनुसूची के पैरा 6(1) के तहत इस पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो हम चुनाव आयोग और अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।"
जन सुराज ने भी साधा निशाना
इस विवाद में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज भी कूद पड़ी है। पार्टी ने इस घटनाक्रम को चुनावी जनादेश का अपमान बताया है और कहा है कि वे इस मामले को संवैधानिक मंचों पर चुनौती देंगे।
फिलहाल, यह मामला बिहार की राजनीति में एक बड़े कानूनी और राजनीतिक संघर्ष की ओर बढ़ता दिख रहा है, जहां अब सबकी नजरें विधान परिषद के सभापति के अगले कदम पर टिकी हैं।