निर्दलीय एमएलसी के भाजपा में शामिल होने से मचा बवाल, सदस्यता पर संकट!

बिहार विधान परिषद के दो निर्दलीय एमएलसी के भाजपा में शामिल होने से दलबदल कानून के तहत उनकी सदस्यता खतरे में है। जानें क्या है पूरा मामला।

Ghazala Saheb31 October 20262 min read0 viewsBihar
निर्दलीय एमएलसी के भाजपा में शामिल होने से मचा बवाल, सदस्यता पर संकट!

बिहार की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित बंसीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. राहुल राज के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद अब उनकी विधान परिषद की सदस्यता खतरे में पड़ गई है।

ये दोनों सदस्य चुनाव के समय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सदन में पहुंचे थे, लेकिन चुनाव जीतने के तुरंत बाद उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। इस कदम ने संविधान के दलबदल विरोधी कानून को लेकर नई बहस छेड़ दी है और अब उनकी सदस्यता पर तलवार लटक गई है।

क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों सदस्यों की सदस्यता को लेकर गंभीर संवैधानिक पेच फंसा हुआ है। संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार स्थिति कुछ इस प्रकार है:

  • दसवीं अनुसूची का पैरा 2(2): इस नियम के तहत, यदि कोई निर्वाचित सदस्य निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ता है और चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसे सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 191(2): संविधान का यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यक्ति दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य पाया जाता है, तो वह राज्य विधायिका का सदस्य बने रहने के लिए पात्र नहीं होगा।

इस मामले में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के सभापति के पास सुरक्षित है।

विपक्ष का तीखा हमला और 'चयनात्मक कार्रवाई' का आरोप

इस घटनाक्रम ने बिहार की सियासत में उबाल ला दिया है। विपक्षी दल आरजेडी (RJD) और तेजस्वी यादव ने भाजपा पर संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करने का गंभीर आरोप लगाया है।

विपक्ष का आरोप है कि भाजपा नियमों का चयनात्मक प्रवर्तन (selective enforcement) करती है। उन्होंने साहेबगंज के विधायक राजू सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि जब विपक्ष के विधायक भाजपा में शामिल होते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती, लेकिन भाजपा अपने हितों के लिए कानून का इस्तेमाल करती है।

अब सबकी नजरें विधान परिषद के सभापति के फैसले पर टिकी हैं कि क्या दलबदल कानून के तहत इन दोनों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाएगी या नहीं।

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