बिहार में शिक्षा क्रांति: अब मातृभाषा में पढ़ेंगे छोटे बच्चे, किताबें तैयार!
बिहार शिक्षा विभाग ने कक्षा 1 और 2 के लिए मातृभाषा में पाठ्यपुस्तकें बनाने की पहल की है। जानें किन भाषाओं में तैयार होंगी किताबें।

बिहार के प्राथमिक स्कूलों में अब पढ़ाई का तरीका बदलने वाला है। अब बच्चों को उनकी अपनी भाषा में पढ़ाई कराई जाएगी, जिससे उनके सीखने की क्षमता में जबरदस्त सुधार होगा। बिहार शिक्षा विभाग ने कक्षा 1 और 2 के छात्रों के लिए मातृभाषा में पाठ्यपुस्तकें तैयार करने की एक ऐतिहासिक पहल शुरू की है।
पटना में शुरू हुआ विशेष प्रशिक्षण
इस महत्वपूर्ण कार्य को सफल बनाने के लिए पटना स्थित राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) द्वारा 28 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक चार दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य चयनित शिक्षकों को उनकी क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यपुस्तकें बनाने की बारीकियों से अवगत कराना है।
इन भाषाओं में तैयार होंगी किताबें
विभाग ने इस योजना के तहत कई क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया है, ताकि हर क्षेत्र के बच्चे अपनी सहज भाषा में शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसमें निम्नलिखित भाषाएँ शामिल हैं:
- भोजपुरी
- मगही
- सुरजापुरी
- बज्जिका
- मैथिली
- अंगिका
शिक्षण सामग्री को सरल, आकर्षक और बच्चों के अनुकूल बनाने के लिए भाषा में दक्षता रखने वाले अनुभवी शिक्षकों का चयन किया गया है।
किशनगंज के शिक्षकों का बढ़ा मान
इस अभियान में किशनगंज जिले के दो शिक्षकों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कुमारी निधि और शिक्षिका शमीम अख्तर को सुरजापुरी भाषा की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने के लिए चुना गया है। ये दोनों शिक्षक पटना में आयोजित होने वाले आवासीय प्रशिक्षण सत्र में भाग लेंगे।
क्यों खास है यह पहल?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चा अपनी मातृभाषा में सीखता है, तो उसकी समझने, अभिव्यक्ति और समग्र सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, मातृभाषा में शिक्षण से बच्चों की समझ और अभिव्यक्ति बेहतर होती है, साथ ही स्कूल के वातावरण के साथ उनका एक मजबूत जुड़ाव भी विकसित होता है।
सुरजापुरी भाषा, जो किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार जिलों में व्यापक रूप से बोली जाती है, के माध्यम से पाठ्यपुस्तकें तैयार करने से न केवल शिक्षा सुलभ होगी, बल्कि नई पीढ़ी के बीच स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और पहचान का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।