बिहार में शराबबंदी के बाद ड्रग्स का कहर, नशीली गोलियों की बढ़ी डिमांड

बिहार में शराबबंदी के बाद अब सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन का खतरा बढ़ गया है। NDPS मामलों और नशीली दवाओं की बरामदगी में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है।

Ghazala Saheb22 October 20263 min read0 viewsBihar
बिहार में शराबबंदी के बाद ड्रग्स का कहर, नशीली गोलियों की बढ़ी डिमांड

बिहार में शराबबंदी लागू हुए एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन राज्य के सामने अब एक नया और कहीं अधिक घातक संकट खड़ा हो गया है। बिहार में नशाखोरी का संकट अब शराब से हटकर सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियों और इंजेक्शन की ओर मुड़ गया है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य में नशीले पदार्थों का कारोबार इतनी तेजी से बढ़ा है कि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) के मामले 2022 के पूरे साल के कुल मामलों से अधिक हो चुके हैं।

आंकड़ों में चौंकाने वाला खुलासा

बिहार पुलिस मुख्यालय और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के डेटा से पता चलता है कि नशीली दवाओं की बरामदगी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में नशीली दवाओं के मामलों की गंभीरता को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:

  • नशीली गोलियां: वर्ष 2022 में जहाँ केवल 29,762 फार्मास्युटिकल टैबलेट बरामद हुई थीं, वहीं 2026 के पहले पांच महीनों में यह संख्या बढ़कर 9.29 लाख तक पहुँच गई है।
  • नशीले इंजेक्शन: वर्ष 2022 में बरामद हुए 3,677 इंजेक्शनों के मुकाबले, 2026 के शुरुआती पांच महीनों में 3.83 लाख इंजेक्शन बरामद किए गए हैं।
  • NDPS मामले: मई 2026 तक पंजीकृत NDPS मामलों की संख्या 1,905 तक पहुँच गई है, जो कि वर्ष 2022 के कुल 1,822 मामलों से अधिक है।

शराब की जगह क्यों ले रहे हैं सिंथेटिक ड्रग्स?

विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी के कारण बाजार में एक 'प्रतिस्थापन प्रभाव' (substitution effect) पैदा हुआ है। शराब पर प्रतिबंध के कारण इसकी कीमतें ब्लैक मार्केट में बहुत बढ़ गई हैं। उदाहरण के तौर पर, जहाँ अन्य राज्यों में एक व्हिस्की की बोतल 650 से 750 रुपये में मिलती है, वहीं बिहार के अवैध बाजार में इसकी कीमत लगभग 1,500 रुपये तक होती है।

इसके विपरीत, नशीले पदार्थों जैसे ब्राउन शुगर के छोटे पैकेट 300 से 500 रुपये में आसानी से उपलब्ध हैं। ये छोटे पैकेट न केवल सस्ते हैं, बल्कि इन्हें ले जाना और छिपाना भी शराब की बड़ी खेपों की तुलना में बहुत आसान है।

तस्करी के खतरनाक रास्ते और 'कोटा' हेरोइन

बिहार की भौगोलिक स्थिति इसे नशीले पदार्थों के लिए एक प्रमुख ट्रांजिट पॉइंट और उपभोग केंद्र बना रही है। नेपाल से सटे होने के कारण यहाँ गंज्या की आवक अधिक रहती है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के माध्यम से हेरोइन, स्मैक और ब्राउन शुगर की तस्करी की जा रही है।

अधिकारियों ने एक विशेष प्रकार की कच्ची हेरोइन की पहचान की है जिसे 'कोटा' कहा जाता है। यह ड्रग्स म्यांमार, लाओस और थाईलैंड क्षेत्र से निकलकर मिजोरम और मणिपुर की सीमाओं के रास्ते बिहार पहुँच रही है।

युवाओं और स्वास्थ्य पर गहरा असर

नशे की इस बढ़ती लहर का सबसे भयावह असर समाज के स्वास्थ्य और युवाओं पर दिख रहा है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, नशा मुक्ति केंद्रों में लाभार्थियों की संख्या में भारी उछाल आया है:

  • 2022-2023 की अवधि में नशा मुक्ति सेवाओं के लाभार्थियों की संख्या 1,487 थी।
  • 2024-2025 की अवधि में यह संख्या बढ़कर 29,429 हो गई है।

इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, अब मरीज पारंपरिक पौधों पर आधारित नशीले पदार्थों के बजाय सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन पर निर्भरता के साथ क्लिनिक पहुँच रहे हैं। इसके अलावा, किशोरों की संलिप्तता भी चिंताजनक रूप से बढ़ी है। वर्ष 2016 से 2023 के बीच NDPS एक्ट के तहत केवल 11 किशोरों को हिरासत में लिया गया था, लेकिन अकेले 2024 में यह संख्या बढ़कर 50 हो गई है।

प्रशासनिक कार्रवाई और राष्ट्रीय लक्ष्य

इस बढ़ते खतरे को देखते हुए बिहार सरकार ने अपनी प्रवर्तन संरचना में बदलाव किया है। सितंबर 2025 में 'प्रोहिबिशन एंड स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो' की स्थापना की गई, जिसमें नशा विरोधी इकाई और शराबबंदी विंग का विलय किया गया। साथ ही, अप्रैल 2025 में स्पेशल टास्क फोर्स ने अवैध खेपों को रोकने के लिए एक समर्पित नार्कोटिक्स सेल भी बनाया है।

यह चुनौती ऐसे समय में आ रही है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'विज़न डॉक्यूमेंट 2026-2029' के तहत 31 दिसंबर, 2029 तक भारत को नशा मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है।

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