'निर्यात में बढ़े दम, तभी मिले औद्योगिक मदद': CEA नागेश्वरन की बड़ी चेतावनी

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि भारत को औद्योगिक सहायता को निर्यात प्रतिस्पर्धा से जोड़ना चाहिए ताकि वैश्विक आपूर्ति झटकों से बचा जा सके।

Ghazala Saheb29 October 20263 min read0 viewsBihar
'निर्यात में बढ़े दम, तभी मिले औद्योगिक मदद': CEA नागेश्वरन की बड़ी चेतावनी

मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंत नागेश्वरन ने भारत की औद्योगिक रणनीति में एक बड़े बदलाव की आवश्यकता जताई है। उन्होंने कहा कि घरेलू विनिर्माण (manufacturing) को मिलने वाली सरकारी सहायता को अब निर्यात प्रतिस्पर्धा और आयात कीमतों के बराबर लाने की क्षमता से जोड़ा जाना चाहिए। यह सुझाव ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण महत्वपूर्ण संसाधनों तक पहुंच अनिश्चित होती जा रही है।

वैश्विक आपूर्ति संकट और संसाधनों की जंग

ISID-IDRA के चौथे राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए नागेश्वरन ने चेतावनी दी कि 21वीं सदी संसाधनों के लिए होने वाले भू-राजनीतिक संघर्षों की होगी। उन्होंने कहा कि अब देश पहले की तरह आसानी से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की उम्मीद नहीं कर सकते।

नागेश्वरन के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े झटके महसूस किए गए हैं, जिनमें एक समान तत्व 'सप्लाई साइड शॉक' रहा है। उन्होंने प्रमुख रूप से इन चुनौतियों का उल्लेख किया:

  • सेमीकंडक्टर चिप की कमी।
  • व्यापारिक जवाबी कार्रवाई से जुड़े टैरिफ।
  • कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता।

उन्होंने जोर देकर कहा कि "देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास अपनी जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए कितना प्रभाव (leverage) है।"

'क्विड प्रो को': मदद के बदले प्रदर्शन की शर्त

CEA ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी आयात प्रतिस्थापन (import substitution) की रणनीति को बदलना होगा। उन्होंने उद्योगों के लिए एक 'क्विड प्रो को' (quid pro quo) मॉडल का प्रस्ताव रखा, जिसका अर्थ है कि उद्योगों को सरकारी सहायता के बदले में निर्यात में मजबूती और प्रतिस्पर्धात्मकता दिखानी होगी।

उनकी प्रस्तावित रणनीति के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • औद्योगिक सहायता समयबद्ध होनी चाहिए और सीधे प्रदर्शन से जुड़ी हो।
  • जैसे ही घरेलू क्षमता प्रतिस्पर्धी हो जाए, संरक्षण (protection) को वापस ले लिया जाना चाहिए।
  • केवल संरक्षण देने से औद्योगिक लचीलापन कमजोर हो सकता है, इसलिए उत्पादकता बढ़ाने के लिए निवेश अनिवार्य है।

आर्थिक आंकड़े और विनिर्माण की चुनौतियां

नागेश्वरन ने भारत के हालिया आर्थिक प्रदर्शन का विवरण भी साझा किया। हालांकि विकास दर मजबूत दिख रही है, लेकिन कुछ आंकड़े चिंता पैदा करते हैं:

  1. जीडीपी विकास: वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी विकास दर 7.8% रही।
  2. विनिर्माण वृद्धि: विनिर्माण सकल मूल्य वर्धित (Manufacturing GVA) में 9.2% की वृद्धि हुई।
  3. पूंजी निर्माण: सकल अचल पूंजी निर्माण (GFCF) में 11.9% की वृद्धि दर्ज की गई।

हालांकि, एक बड़ी चुनौती यह है कि विनिर्माण का सकल मूल्य वर्धित में हिस्सा लगभग 14.8% पर स्थिर बना हुआ है, जो 2022-23 के 14.7% के लगभग बराबर ही है। इसके अलावा, अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान मुख्य व्यापारिक आयात में 19.7% की वृद्धि हुई, जो कोर निर्यात की 16.2% की वृद्धि से काफी अधिक है।

भविष्य की राह: उत्पादन और उत्पादकता पर जोर

नागेश्वरन ने स्पष्ट किया कि जब समस्या मांग की कमी के बजाय वस्तुओं की कमी (supply shortage) से जुड़ी हो, तो पारंपरिक मौद्रिक नीति कम प्रभावी होती है। उन्होंने सुझाव दिया कि राजकोषीय सहायता का सही उपयोग उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में होना चाहिए।

"भारत को आवश्यक वस्तुओं का बफर बनाना होगा और घरेलू विनिर्माण को इतना मजबूत करना होगा कि वह बाहरी झटकों को सह सके और वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बन सके।"
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