दिल्ली हाईकोर्ट का केंद्र और IRCTC को नोटिस, गर्भवती महिलाओं के लिए लोअर बर्थ बुकिंग पर मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार और IRCTC को नोटिस जारी किया। यह नोटिस गर्भवती महिलाओं के लिए रेलवे आरक्षण नीति के तहत ऑनलाइन लोअर बर्थ बुकिंग की सुविधा मांगने वाली जनहित याचिका पर जारी किया गया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने याचिका में उठाए गए मुद्दों पर केंद्र और IRCTC से स्पष्टीकरण मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।
याचिका में क्या मांग की गई है?
यह जनहित याचिका वकील अनुनय सहाय द्वारा दायर की गई है। याचिका में रेलवे अधिकारियों और IRCTC को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे गर्भवती महिलाओं को उपलब्धता और उचित सत्यापन के अधीन IRCTC वेबसाइट और मोबाइल ऐप के माध्यम से लोअर बर्थ का आवंटन प्राप्त करने के लिए एक प्रभावी ऑनलाइन तंत्र प्रदान करें। याचिका में सवाल उठाया गया है कि गर्भवती महिलाओं को लोअर बर्थ की सुविधा का लाभ उठाने के लिए फिजिकल पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम काउंटर पर जाने की आवश्यकता क्यों है, जबकि अन्य पात्र श्रेणियों के लिए संबंधित आरक्षण सुविधाएं IRCTC के डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक्सेस की जा सकती हैं।
मौजूदा नीति और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सवाल
मौजूदा रेलवे आरक्षण नीति गर्भवती महिलाओं को उपलब्धता के अधीन लोअर बर्थ के लिए पात्र मानती है। हालांकि, याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस सुविधा चाहने वाली पात्र गर्भवती महिला को पीआरएस काउंटर पर रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जारी प्रेगनेंसी सर्टिफिकेट दिखाना होता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि इससे गर्भवती महिलाओं के लिए एक अतिरिक्त फिजिकल बाधा उत्पन्न होती है, जबकि रेलवे आरक्षण सेवाएं काफी हद तक डिजिटल हो चुकी हैं। याचिका में यह भी बताया गया है कि IRCTC के अपने नियम और शर्तें इसके ई-टिकटिंग प्लेटफॉर्म पर लोअर बर्थ और सीनियर सिटीजन कोटा को मान्यता देती हैं।
संविधान के अनुच्छेदों का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को मनमाना, अनुचित और भेदभावपूर्ण बताया है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि अधिकारी इसके बजाय ऑनलाइन सेल्फ डिक्लेरेशन, रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जारी सर्टिफिकेट को अपलोड करने, या यात्रा के दौरान टिकट परीक्षक द्वारा बाद के सत्यापन के अधीन बुकिंग जैसे तंत्र शुरू कर सकते हैं। इसमें उपलब्धता के अधीन गर्भवती महिलाओं को एक पात्र श्रेणी के रूप में पहचानने के लिए मौजूदा लोअर-बर्थ आवंटन एल्गोरिदम को संशोधित करने का भी सुझाव दिया गया है।
अधिकारियों से जवाब और समयसीमा की मांग
हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले याचिकाकर्ता ने 30 अगस्त को रेल मंत्री, रेलवे बोर्ड और IRCTC के सामने इस मुद्दे को उठाया था। याचिका के अनुसार, IRCTC ने 1 सितंबर को जवाब दिया था कि इस सुझाव को भविष्य के सुधारों के लिए नोट कर लिया गया है और इस पर बहुत गंभीर विचार किया जाएगा। याचिका में अधिकारियों को केवल लोअर बर्थ सुविधा का लाभ उठाने के लिए फिजिकल रिजर्वेशन काउंटर पर जाना अनिवार्य किए बिना प्रेगनेंसी के सत्यापन के लिए एक उचित, गैर-भेदभावपूर्ण और तकनीकी रूप से व्यवहार्य तंत्र तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें प्रतिवादियों द्वारा एक हलफनामे के माध्यम से ऐसे तंत्र को लागू करने के लिए उठाए जा रहे कदमों और प्रस्तावित समयसीमा का खुलासा करने की भी मांग की गई है।