एकादशी पर रावण दहन: परंपरा या विवाद? आचार्य ने दी सफाई

अररिया के फारबिसगंज में एकादशी के दिन रावण दहन को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़े विवाद के बीच बनारस के आचार्य शांतनु अग्निहोत्री ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि धर्म केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक परंपराओं और लोकाचार से भी चलता है।
क्या है पूरा विवाद?
श्री रामनवमी पूजा समिति द्वारा फारबिसगंज के हवाई अड्डा मैदान में गुरुवार को होने वाले रावण दहन के कार्यक्रम को लेकर एक वर्ग द्वारा आपत्ति जताई जा रही थी। सोशल मीडिया पर एकादशी के दिन रावण दहन को लेकर लगातार निशाना साधा जा रहा था, जिसके बाद आयोजन समिति ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इस भ्रम को दूर करने का प्रयास किया और सभी से सहयोग की अपील की।
धर्म जोड़ने का माध्यम है, तोड़ने का नहीं
आचार्य शांतनु अग्निहोत्री ने इस मुद्दे पर कहा कि धर्म हमें जोड़ना सिखाता है, तोड़ना नहीं। विजयादशमी का पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है और इसमें सभी सनातनियों का सहयोग आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
"धर्म धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ लोक परंपरा, मान्यता और लोकाचार से भी चलता है। ऐसे में सर्वजन की सहमति और सकारात्मक सहयोग जरूरी है।"
देश के अन्य हिस्सों में भी है ऐसी परंपरा
आचार्य ने बताया कि एकादशी पर रावण दहन की परंपरा देश के कई अन्य हिस्सों में भी लंबे समय से प्रचलित है। उन्होंने निम्नलिखित उदाहरण दिए:
- उत्तर प्रदेश: मैनपुरी में करीब 200 साल पुरानी परंपरा है, जहाँ महाराज तेज सिंह जूदेव की सवारी और श्रीराम के पूजन के बाद एकादशी तिथि को रावण का वध किया जाता है। इसके अलावा कुरावली, बेवर और भोगांव में भी अलग-अलग तिथियों पर ऐसे आयोजन होते हैं।
- पंजाब: फतेहगढ़ में भी एकादशी के दिन रावण दहन का कार्यक्रम किया जाता रहा है।
- छत्तीसगढ़: चन्द्रखुरी में भी एकादशी पर यह परंपरा निभाई जाती है।
इस प्रेस वार्ता के दौरान वीरेंद्र प्रसाद उर्फ मिंटू, डिम्पल चौधरी, राजू साह, प्रेम केशरी, करण सिंह, उमाशंकर उर्फ बुलबुल यादव, आशुतोष पराशर, कार्तिक सिंह, मुनचुन मिश्रा, रविशंकर यादव, गौरव चौधरी और अंकित कुमार सहित कई लोग उपस्थित थे। समिति का उद्देश्य समाज में व्याप्त मत और भ्रम को दूर कर संस्कृति के माध्यम से लोगों को एकजुट करना है।