साल 2024 में फर्जी राजनीतिक दलों को मिला 1700 करोड़ रुपये का चंदा, आम जनमत पार्टी को अकेले मिले 620 करोड़

Akhand India Desk5 September 20262 min read4 viewsDharm
साल 2024 में फर्जी राजनीतिक दलों को मिला 1700 करोड़ रुपये का चंदा, आम जनमत पार्टी को अकेले मिले 620 करोड़

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान एक अज्ञात राजनीतिक दल आम जनमत पार्टी को केवल एक उम्मीदवार उतारने के बावजूद 620 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इस खुलासे से पता चलता है कि गुजरात स्थित छह फर्जी दलों ने कुल 1700 करोड़ रुपये एकत्र किए, जो पांच राष्ट्रीय दलों के कुल चंदे से भी अधिक है।

गुजरात में पंजीकृत हैं ये दल

आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार आम जनमत पार्टी का पंजीकृत कार्यालय गुजरात में है। यह चिंता का विषय है कि इस संगठन के नेतृत्व में एक प्रमुख भाजपा नेता इसके पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। जांचकर्ताओं द्वारा जुटाए गए विवरण से पता चलता है कि ये सभी छह संस्थाएं गुजरात में पंजीकृत हैं, जिससे राजनीतिक चंदा तंत्र के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।

चुनावी फंडिंग के पीछे का संदर्भ

शोध से संकेत मिलता है कि आम जनमत पार्टी को 2020 में पंजीकृत किया गया था और 2023-2024 वित्तीय वर्ष के दौरान इसे भारी मात्रा में चंदा मिला। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने चुनाव आयोग के आंकड़ों का विश्लेषण करके इन विसंगतियों को उजागर किया है।

नियामक अंतराल और जांच

भारत के चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि हालांकि उसे व्यय रिपोर्ट मिलती है, लेकिन उसके पास इनदान के विशिष्ट स्रोतों या मात्रा का ऑडिट करने का कानूनी अधिकार नहीं है। आयकर विभाग ने पहले ही कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी फंड की आवाजाही के लिए उपयोग किए जाने वाले 63 फर्जी राजनीतिक दलों के एक व्यापक नेटवर्क की पहचान कर ली है।

operational irregularities found

झारखंड आयकर विभाग की जांच में पता चला कि आम जनमत पार्टी ने विरोध गतिविधियों और 700 करोड़ रुपये के चुनावी खर्च के लिए फर्जी खाते बनाए रखे। सत्यवादी रक्षक पार्टी जैसे अन्य दलों ने प्रचार के बजाय इसे सामाजिक कल्याण पर खर्च करने का दावा करते हुए 330.55 करोड़ रुपये मिलने की सूचना दी।

जवाबदेही की मांग

दिग्विजय सिंह सहित राजनीतिक नेताओं ने प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग से इन बैंक खातों की तत्काल जांच की मांग की है। राहुल गांधी ने भी इन महत्वपूर्ण वित्तीय विसंगतियों की निगरानी करने में चुनाव आयोग की विफलता के बारे में सार्वजनिक सवाल उठाए हैं।

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