हिमाचल को मिला 'दिवाली गिफ्ट': BBMB बिजली शेयर से सालाना 800 करोड़ का फायदा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हिमाचल प्रदेश को सालाना 600-800 करोड़ रुपये का फायदा होगा। BBMB बिजली शेयर पर आया ऐतिहासिक फैसला।

हिमाचल प्रदेश के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला किसी बड़े त्योहार के तोहफे से कम नहीं है। भकरा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) के साथ चल रहे बिजली शेयर के लंबे विवाद पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने राज्य के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। एडवोकेट जनरल अनुप कुमार रतन ने इस फैसले को प्रदेश के लिए एक 'दिवाली गिफ्ट' करार दिया है, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति को जबरदस्त मजबूती मिलेगी।
सालाना 800 करोड़ तक की होगी कमाई
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद हिमाचल प्रदेश को सालाना 600 करोड़ से लेकर 800 करोड़ रुपये तक का आर्थिक लाभ होने की उम्मीद है। एडवोकेट जनरल ने बताया कि BBMB को हिमाचल प्रदेश के लंबे समय से लंबित 11,973 मिलियन यूनिट बिजली शेयर को तुरंत जारी करने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले में पिछले समय के बकाया (arrears) को भी शामिल किया गया है।
अगर बिजली की औसत कीमत 10 रुपये प्रति यूनिट भी मानी जाए, तो राज्य को हर साल भारी राजस्व प्राप्त होगा। एडवोकेट जनरल के अनुसार, "अगले 20 वर्षों में, इस बिजली शेयर से होने वाला कुल लाभ लगभग 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।"
कैश के बजाय बिजली लेने का मास्टरस्ट्रोक
इस मामले में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। पहले यह विचार था कि राज्य को बिजली के बदले नकद मुआवजा दिया जाए, लेकिन मुख्यमंत्री ने बिजली के रूप में अपना हिस्सा लेने का फैसला किया। इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति थी:
- बढ़ती मांग: बिजली की मांग और बाजार दरें लगातार बढ़ रही हैं।
- सही समय का चुनाव: सरकार ने सुनिश्चित किया है कि यह बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच दी जाए, जब हिमाचल में बिजली की मांग और बाजार में कीमतें सबसे अधिक होती हैं।
- अधिकतम राजस्व: इस रणनीति से राज्य अतिरिक्त बिजली को ऊंचे दामों पर बेचकर अपना मुनाफा अधिकतम कर सकेगा।
किसाऊ बांध और कानूनी संघर्ष की कहानी
यह विवाद 1996 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। एडवोकेट जनरल ने बताया कि केंद्र सरकार का पिछला प्रस्ताव हिमाचल के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर रहा था। किसाऊ बांध परियोजना के मामले में भी मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि इस परियोजना के लिए हिमाचल की जमीन का उपयोग हो रहा है और वहां के लोग विस्थापित हो रहे हैं, इसलिए राज्य को बिजली घटक (power component) की निर्माण लागत का आधा बोझ नहीं उठाना चाहिए।
कानूनी लड़ाई के दौरान एक बड़ा मोड़ तब आया जब हरियाणा सरकार ने भारत के अटॉर्नी जनरल के पक्ष का समर्थन किया, जिससे हिमाचल की स्थिति काफी मजबूत हो गई। हालांकि, पंजाब सरकार ने अंतिम चरण तक हिमाचल के दावे का विरोध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया।
इस ऐतिहासिक जीत को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के राजनीतिक नेतृत्व और प्रयासों का परिणाम बताया जा रहा है, जिससे राज्य को आने वाले वर्षों में एक स्थायी और मजबूत राजस्व स्रोत प्राप्त होगा।