कर्ज के मामले में दुनिया को पछाड़ेगा भारत, RBI डिप्टी गवर्नर का बड़ा दावा
आरबीआई डिप्टी गवर्नर के अनुसार, 2031 तक भारत दुनिया की एकमात्र उभरती अर्थव्यवस्था होगी जो अपना कर्ज कम करने में सफल रहेगी।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने एक बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, 2031 तक भारत दुनिया की उन नौ बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एकमात्र देश होगा, जो अपने कर्ज के अनुपात (debt-to-GDP ratio) को कम करने में सफल रहेगा। जहाँ पूरी दुनिया बढ़ते कर्ज और बढ़ती ब्याज दरों के संकट से जूझ रही है, वहीं भारत की वित्तीय स्थिति मजबूत होने का अनुमान लगाया गया है।
वैश्विक संकट के बीच भारत की मजबूती
बिजनेस स्टैंडर्ड BFSI इनसाइट समिट को संबोधित करते हुए गुप्ता ने बताया कि भारत का सरकारी कर्ज जीडीपी के 84.3 प्रतिशत (2025-26) से घटकर 75.1 प्रतिशत (2031-32) तक आ सकता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अधिकांश विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज का अनुपात बढ़ने की उम्मीद है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने वैश्विक स्थिति की गंभीरता को भी स्पष्ट किया:
- वैश्विक सार्वजनिक ऋण: 2025 में यह जीडीपी का 94% था, जो 2031 तक बढ़कर 102% तक पहुँचने की संभावना है।
- विकसित अर्थव्यवस्थाएं: इनका कर्ज अनुपात 2025 में 108.2% से बढ़कर 2031 में 115.2% होने का अनुमान है।
- उभरती अर्थव्यवस्थाएं: इनका कर्ज अनुपात 73.7% से बढ़कर 84.2% होने की उम्मीद है।
कैसे कम होगा देश का कर्ज?
RBI डिप्टी गवर्नर ने भारत के इस सकारात्मक भविष्य के पीछे तीन मुख्य कारणों को रेखांकित किया है:
- मजबूत जीडीपी विकास: भारत की नाममात्र जीडीपी (Nominal GDP) विकास दर सालाना लगभग 11% रहने का अनुमान है। यह सरकारी कर्ज पर लगने वाली प्रभावी ब्याज दर (जो लगभग 7% है) से काफी अधिक है, जिससे कर्ज का अनुपात अपने आप कम होता जा रहा है।
- राजकोषीय सुदृढ़ीकरण: बेहतर राजकोषीय प्रबंधन और कम प्राथमिक घाटे ने देश की आर्थिक स्थिति को संभाला है।
- पूंजीगत व्यय में सुधार: सरकार के पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। 2019-20 में यह जीडीपी का लगभग 4% था, जो 2025-26 में बढ़कर 5.8% होने का अनुमान है। उच्च पूंजीगत व्यय से निजी निवेश आकर्षित होता है, जो अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को बढ़ाता है।
भारत के लिए कम जोखिम वाली स्थिति
गुप्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का सार्वजनिक कर्ज काफी हद तक लंबी अवधि का है और यह घरेलू मुद्रा में ही है। चूंकि यह कर्ज मुख्य रूप से देश के भीतर ही रखा गया है, इसलिए रिफाइनेंसिंग (कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना) का जोखिम बहुत कम है।
हालांकि, उन्होंने एक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरों और अत्यधिक कर्ज के कारण भविष्य के आर्थिक झटकों से निपटने की सरकारों की क्षमता सीमित हो सकती है। ऐसे में भारत ने केवल राजकोषीय उपायों पर निर्भर रहने के बजाय बाहरी झटकों को प्रबंधित करते हुए वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है।