'वसुधैव कुटुंबकम' सिर्फ उपदेश नहीं, भारत इसे निभाता है: जयशंकर

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत वैक्सीन आपूर्ति और मानवीय सहायता के जरिए 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत को सच कर रहा है।

Ghazala Saheb25 October 20262 min read0 viewsBihar
'वसुधैव कुटुंबकम' सिर्फ उपदेश नहीं, भारत इसे निभाता है: जयशंकर

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 'चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन' में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की वैश्विक भूमिका और उसकी प्रतिबद्धता पर एक बड़ा बयान दिया। संयुक्त राष्ट्र दिवस के अवसर पर दिए अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत 'वसुधैव कुटुंबकम' (दुनिया एक परिवार है) के सिद्धांत को केवल शब्दों में नहीं कहता, बल्कि इसे अपने कार्यों के माध्यम से पूरी दुनिया के सामने साबित करता है।

वैक्सीन और विकास साझेदारी के जरिए वैश्विक सहयोग

जयशंकर ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि जब दुनिया सबसे कठिन दौर से गुजर रही थी, तब भारत ने उन देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने का फैसला किया जो शायद पीछे छूट सकते थे। उन्होंने कहा कि भारत ने यह कदम तब उठाया जब देश में खुद का टीकाकरण अभियान चल रहा था। भारत की वैश्विक पहुंच को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया:

  • भारत की विकास साझेदारी आज 78 देशों तक विस्तृत है।
  • इन देशों में सैकड़ों विकास परियोजनाएं सक्रिय रूप से चल रही हैं।
  • भारत के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण संस्थान दुनिया भर के लोगों के लिए उपलब्ध हैं।

संकट के समय 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' की भूमिका

विदेश मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत संकट के समय हमेशा मदद के लिए सबसे पहले आगे आता है। उन्होंने कहा, "चाहे हम नेपाल और श्रीलंका की बात करें, या वेनेजुएला और जमैका की, 'वसुधैव कुटुंबकम' का सिद्धांत केवल कहा नहीं जाता, बल्कि इसे निभाया जाता है।"

वैश्विक संघर्ष और कूटनीति की आवश्यकता

वर्तमान में दुनिया में चल रहे प्रमुख संघर्षों, विशेष रूप से यूक्रेन और पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) के युद्धों पर चिंता व्यक्त करते हुए जयशंकर ने कहा कि इन संघर्षों का असर उन लोगों और अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ रहा है, जिनका इन मामलों में कोई सीधा लेना-देना नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा:

"हम मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। भारत हमेशा यही कहता है कि संवाद और कूटनीति ही एकमात्र समाधान हैं।"

संयुक्त राष्ट्र में सुधार की पुरजोर मांग

अंत में, उन्होंने वैश्विक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को केवल वैश्विक संकटों का दर्शक नहीं बनना चाहिए, बल्कि नेतृत्व करना चाहिए। उन्होंने 'सुधारित बहुपक्षवाद' (Reformed Multilateralism) की वकालत करते हुए कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में दुनिया के बड़े हिस्सों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि वैश्विक चुनौतियों का सामना सामूहिक रूप से प्रभावी ढंग से किया जा सके।

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