'UCC देश की जरूरत, राज्य अकेले इसे लागू नहीं कर सकते': पूर्व जस्टिस संजय करोल
पूर्व जस्टिस संजय करोल ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) देश की जरूरत है और इसे केवल केंद्र सरकार ही लागू कर सकती है।

नई दिल्ली में आयोजित 'नेशनल लीगल डायलॉग' के दौरान पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय करोल ने समान नागरिक संहिता (UCC) पर एक बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कानून में एकरूपता लाने के लिए UCC आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
केंद्र सरकार ही बना सकती है कानून
जस्टिस करोल ने इस बात पर जोर दिया कि पूरे देश के लिए एक केंद्रीय नागरिक संहिता होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विविधता वाले राज्य व्यक्तिगत रूप से इस कानून को लागू कर सकते हैं? उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल केंद्र ही इस मामले में केंद्रीय कानून बना सकता है।
"समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिए होनी चाहिए। राज्यों के पास विविधता है, इसलिए इसे व्यक्तिगत रूप से लागू करना कठिन होगा।"
बिहार की सामाजिक एकता की सराहना
इस कार्यक्रम के दौरान जस्टिस करोल ने बिहार की सामाजिक एकता और धर्मनिरपेक्षता की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि यदि कोई धर्मनिरपेक्षता या अनुच्छेद 44 का वास्तविक स्वरूप देखना चाहता है, तो उसे बिहार आना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में हर समुदाय के लोग जाति से परे होकर छठ पूजा मनाते हैं।
विभाजनकारी नीतियों और विवाह पर बहस
कार्यक्रम में उत्तराखंड की UCC मसौदा और नियम बनाने वाली समिति की सदस्य मनु गौर ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई थी और धर्म व जाति का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों को अलग करने के लिए शरीयत कानून भी पेश किया था।
मनु गौर ने विवाह के स्वरूप पर चर्चा करते हुए कहा:
- हिंदुओं में विवाह एक संस्कार है।
- अन्य धर्मों में यह एक अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) है।
उन्होंने शाह बानो और सौरभ बानो जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन मामलों से पहले मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में व्यापक जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि उत्तराखंड में 'हलाला' प्रथा के खिलाफ एक याचिका लंबित है।
राज्य स्तर पर UCC लागू करने में चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोमी चाको ने तर्क दिया कि अलग-अलग राज्यों द्वारा UCC पारित करना प्रभावी नहीं होगा। उनके अनुसार, राज्य अपने सामाजिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार कानून बनाएंगे, जिससे लोग कानून से बचने के लिए अपना निवास स्थान बदल सकते हैं।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम से पहले बहुविवाह जैसी समस्याएं काफी बड़ी थीं, जिसे इस अधिनियम ने नियंत्रित किया और यह सुनिश्चित किया कि कोई व्यक्ति एक से अधिक विवाह न कर सके।