किशनगंज: एनीमिया से जंग के लिए स्वास्थ्य विभाग की बड़ी मुहिम
किशनगंज में गर्भवती महिलाओं को एनीमिया से बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जागरूकता अभियान चलाया। जानें डॉक्टर की महत्वपूर्ण सलाह और बचाव के तरीके।

किशनगंज में 'एनीमिया मुक्त भारत' अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। 'ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस' के अवसर पर जिले के विभिन्न स्वास्थ्य उप-केंद्रों और आंगनवाड़ी केंद्रों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाया गया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं में खून की कमी यानी एनीमिया की समस्या को रोकना और उनके स्वास्थ्य में सुधार करना है।
गर्भावस्था में एनीमिया के गंभीर खतरे
स्वास्थ्य अभियान के दौरान महिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. शबनम यस्मीन ने एनीमिया के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया होने से मां के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
"एनीमिया के कारण गर्भवती महिलाओं में अत्यधिक थकान, संक्रमण का खतरा और प्रसव के दौरान गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।"
डॉ. यस्मीन ने यह भी स्पष्ट किया कि यह समस्या केवल मां तक सीमित नहीं है। गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी यह बेहद घातक हो सकता है। एनीमिया के कारण शिशु का वजन कम होना, समय से पहले जन्म (प्रीमैच्योर बर्थ) और बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास में बाधा आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
क्या खाएं और किन चीजों से परहेज करें?
स्वास्थ्य कर्मियों ने महिलाओं को सही पोषण के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एनीमिया से लड़ने के लिए आहार में आयरन और विटामिन सी का सही तालमेल होना बहुत जरूरी है।
पोषण के लिए जरूरी आहार:
- आयरन युक्त भोजन: हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, चना और अंकुरित अनाज का सेवन करें।
- विटामिन सी का महत्व: शरीर में आयरन के बेहतर अवशोषण के लिए आंवला, अमरूद और नींबू जैसे विटामिन सी युक्त फलों को आहार में शामिल करें।
सावधानी:
डॉक्टरों ने विशेष रूप से सलाह दी है कि भोजन करने के तुरंत बाद चाय या कॉफी का सेवन न करें, क्योंकि यह शरीर को भोजन से मिलने वाले आयरन को सोखने में बाधा डालता है।
जांच और उपचार की अनिवार्यता
अभियान के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने जोर देकर कहा कि एनीमिया की पहचान केवल बाहरी लक्षणों के आधार पर नहीं की जा सकती। इसके लिए हीमोग्लोबिन की क्लिनिकल जांच अनिवार्य है। इस अभियान के माध्यम से हीमोग्लोबिन परीक्षण, कृमि मुक्ति (deworming) और पोषण संबंधी परामर्श दिया जा रहा है। यदि किसी महिला का हीमोग्लोबिन स्तर बहुत कम पाया जाता है, तो उन्हें तुरंत उच्च स्तरीय स्वास्थ्य संस्थानों में इलाज कराने की सलाह दी गई है।
आशा कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका
इस पूरे अभियान की सफलता में आशा कार्यकर्ताओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। समुदाय के स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाने में वे रीढ़ की हड्डी साबित हो रही हैं।
इसका एक जीवंत उदाहरण दिघलबंक के तुलसिया गांव में देखने को मिला, जहां आशा कार्यकर्ता रीता देवी ने अपनी सक्रियता से एक गर्भवती महिला, राधा, में एनीमिया की पहचान की। पहचान होने के बाद, रीता देवी ने न केवल राधा के आयरन-फॉलिक एसिड के नियमित सेवन की निगरानी की, बल्कि उनके पोषण और नियमित स्वास्थ्य जांच को भी सुनिश्चित किया। इस तरह के प्रयासों से ही एनीमिया मुक्त समाज का सपना साकार हो सकेगा।