543 सांसद पर्याप्त, जरूरत संसद को सक्षम बनाने की: कांग्रेस की मांग और परिसीमन पर बहस

Akhand India Desk20 August 20263 min read1 views
543 सांसद पर्याप्त, जरूरत संसद को सक्षम बनाने की: कांग्रेस की मांग और परिसीमन पर बहस

लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की कांग्रेस कार्यसमिति की मांग ने परिसीमन की बहस को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस ने 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग भी की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय भी इससे पहले लोकसभा की सदस्य संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने और राज्यों के बीच मौजूदा सीट-वितरण को कायम रखने की मांग कर चुके हैं। इस लेख में सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय वर्तमान सांसदों की कार्यक्षमता बढ़ाने और संसद की कार्यसंस्कृति पर बात की गई है।

सांसदों की कार्यक्षमता बढ़ाने की जरूरत

सवाल यह नहीं है कि लोकसभा में सांसदों की संख्या कितनी होनी चाहिए, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जितने सांसद देश ने चुने हैं, वे अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता और प्रभावशीलता से निभा रहे हैं। देश में लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के अलावा हर राज्य में विधायक और गांवों में सरपंच तथा स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि मौजूद हैं। सांसदों की संख्या बढ़ाने से पहले यह देखना अधिक जरूरी है कि वर्तमान सांसदों की कार्यक्षमता कैसे बढ़ाई जाए। एक सांसद के सामने संसदीय जिम्मेदारियों के साथ अपने विशाल निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को देखने की चुनौती भी रहती है। इसलिए सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय प्रत्येक सांसद को अधिक सक्षम कार्यालय, पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ, शोधकर्ता, विधायी विशेषज्ञ और आधुनिक डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। सांसद को अपने क्षेत्र और संसद के बीच सक्रिय सेतु बनाया जाना चाहिए।

संसद की कार्यवाही और उत्पादकता

सबसे बड़ी चिंता संसद की कार्यवाही को लेकर है। 2026 के मानसून सत्र में लोकसभा निर्धारित समय का केवल 15 प्रतिशत और राज्यसभा 33 प्रतिशत समय ही काम कर सके। प्रश्नकाल भी लोकसभा में निर्धारित समय के केवल एक प्रतिशत तक सीमित रह गया। संसद का कीमती समय हंगामे, नारेबाजी और लगातार स्थगन में जाने पर सांसदों की संख्या बढ़ाने का औचित्य समझना कठिन है। इससे पहले 2026 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता लगभग 93 प्रतिशत और राज्यसभा की 110 प्रतिशत रही थी। यानी समस्या संख्या की नहीं, कार्यसंस्कृति की भी है।

व्यापक संसदीय सुधार और जवाबदेही

एक व्यापक संसदीय सुधार की जरूरत है। सांसदों के लिए निर्वाचन क्षेत्र में नियमित जनसंपर्क और दौरे की न्यूनतम अनिवार्यता तय हो। संसद में उनकी उपस्थिति, प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने, समितियों के काम और निर्वाचन क्षेत्र में किए गए कार्यों का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड जारी हो। जनता को भी अपने सांसद के पांच वर्ष के काम का हिसाब देखने का अधिकार होना चाहिए। संसद में जानबूझकर व्यवधान पैदा करना लोकतांत्रिक अधिकार की आड़ में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लगातार व्यवधान डालने वालों पर स्पष्ट आचार-संहिता, वेतन-भत्तों से संबंधित दंड और सदन की सदस्यता संबंधी कठोर लेकिन न्यायसंगत नियम बनाए जा सकते हैं।

महिला आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व

2023 के 106वें संविधान संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया था। मौजूदा व्यवस्था में इसका क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जुड़ा हुआ है। 2026 में सरकार द्वारा लाए गए संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव में इसी प्रक्रिया को बदलने का प्रयास किया गया था, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका। राजनीतिक सहमति बनती है तो महिलाओं को 2029 से ही पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए संवैधानिक रास्ता तलाशा जा सकता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व टालना उचित नहीं है, लेकिन इसके लिए परिसीमन, राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन पर व्यापक सहमति आवश्यक है। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति सांसदों की गिनती में नहीं, उनके काम की गुणवत्ता में है।

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