'भारत ही असली निशाना': मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- देश को तोड़ने की हो रही साजिश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने देश की सुरक्षा और अखंडता को लेकर एक बेहद गंभीर चेतावनी दी है। नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित आरएसएस के शताब्दी विजयदशमी उत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ 'तामसिक शक्तियां' भारत, हिंदू समाज और संघ को तोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
'सत्ता परिवर्तन' की कोशिशों पर बड़ा हमला
मोहन भागवत ने 'सत्ता परिवर्तन' (regime change) के प्रयासों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि दुनिया भर में कुछ ताकतें अपनी कठपुतलियों के जरिए प्रभाव डालने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा:
"सत्ता बदलने से स्थिति बदल जाएगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। न अतीत में और न ही आज। जो लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति करना चाहते हैं, वे हमेशा कठपुतलियों का इस्तेमाल करते हैं। भारत का बढ़ता हुआ प्रभाव इन गतिविधियों को रोक देगा, और इसीलिए भारत ही उनका असली निशाना है।"
भागवत ने आगे कहा कि इन ताकतों का उद्देश्य भारत, हिंदू और संघ को 'डिसमेंटलिंग' यानी टुकड़े-टुकड़े करने का है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और सत्ता के लालच में अंधे लोग इन ताकतों को अनजाने में समर्थन दे रहे हैं।
विरोध प्रदर्शनों और लोकतंत्र पर क्या बोले भागवत?
हाल के दिनों में दिल्ली में विभिन्न राजनीतिक और छात्र संगठनों द्वारा 'सत्ता परिवर्तन' जैसे शब्दों के इस्तेमाल और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच भागवत के ये बयान काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। उन्होंने लोकतंत्र में विरोध की भूमिका पर स्पष्ट राय रखी:
- समाधान पर जोर: उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों का होना स्वाभाविक है, लेकिन विरोध का उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए, न कि नई समस्याएं पैदा करना।
- समाज में विभाजन से बचें: भागवत ने चेतावनी दी कि राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके कार्यों से समाज में नफरत, विद्वेष या विभाजन पैदा न हो।
- संवैधानिक मर्यादा: उन्होंने प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक नेताओं और प्रशासन से अपील की कि वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें और कानून एवं संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही कार्य करें।
उन्होंने जोर देकर कहा कि सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ के लालच में आकर विवेक और सद्भावना का त्याग नहीं करना चाहिए।
वंदे मातरम की प्रासंगिकता
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह गीत आज भी प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है और इसे पूरे गर्व और सम्मान के साथ गाया जाना चाहिए।