मोतिहारी का भवानी मंडप: 115 वर्षों से जारी दुर्गा पूजा की अनूठी परंपरा

मोतिहारी के भवानी मंडप में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहाँ की मोतिहारी भवानी मंडप दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंपारण की समृद्ध बंगाली विरासत का एक जीवंत प्रतीक है। 115 वर्षों से अधिक समय से यह परंपरा यहाँ की सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।
1912 से शुरू हुआ ऐतिहासिक सफर
इस गौरवशाली परंपरा की नींव वर्ष 1912 में रखी गई थी। उस समय चंपारण में बसे कुछ बंगाली परिवारों ने यादव लाल साह के प्रांगण में पहली बार इस पूजा का आयोजन किया था। पूजा संपन्न कराने के लिए बनारस से भट्टाचार्य पुरोहित बंधुओं को बुलाया गया था।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस परंपरा को मजबूत करने में कई बड़े नामों का हाथ रहा है। नील आंदोलन के दौरान देशबंधु चितरंजन दास ने यहाँ के बंगाली समाज को आर्थिक मदद दी, जिससे पूजा के लिए एक स्थायी स्थान की व्यवस्था हो सकी। इसके बाद, अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू. एस. इरविन ने भी जमीन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1922 में ज्ञान बाबू चौक स्थित भवानी मंडप में यह परंपरा फिर से स्थापित हुई।
हालांकि, 1934 के विनाशकारी भूकंप ने इस मंडप को काफी नुकसान पहुँचाया था, लेकिन स्थानीय लोगों के सहयोग से इसे दोबारा बनाया गया। आजादी के बाद यह स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
सोने के आभूषणों से सजी मां दुर्गा की प्रतिमा
भवानी मंडप की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की देवी प्रतिमा है। चंपारण में यह संभवतः एकमात्र ऐसा स्थान है, जहाँ मां दुर्गा का श्रृंगार सोने के आभूषणों से किया जाता है। इस भव्यता को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
पूजा के दौरान यहाँ का माहौल पूरी तरह से बंगाली संस्कृति में रंग जाता है। यहाँ होने वाले प्रमुख आकर्षण इस प्रकार हैं:
- ढाक की गूंज और शंखनाद के बीच होने वाली विशेष आरती।
- पारंपरिक धुनुची नृत्य का मनमोहक दृश्य।
- षष्ठी के बोधन से लेकर दशमी के सिंदूर खेला तक की रस्में।
- प्रतिदिन श्रद्धालुओं को परोसा जाने वाला विशेष भोग।
बदलते परिवेश में भी अडिग है आस्था
समय के साथ मोतिहारी के बंगाली समाज में बदलाव आया है। बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में कई परिवार दूसरे शहरों की ओर पलायन कर गए हैं, जिससे यहाँ बंगाली परिवारों की संख्या कम हुई है। इसके बावजूद, बंगाली इंस्टीट्यूट और दुर्गा पूजा समिति इस विरासत को सहेजने में पूरी तरह समर्पित हैं।
बंगाली इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष डॉ. भास्कर राय और सचिव डॉ. अजीत कुमार के साथ-साथ दुर्गा पूजा समिति के मणीन्द्रनाथ दास और सहसचिव असीम मुखर्जी इस आयोजन को सफलतापूर्वक संपन्न कराने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
आज भी यहाँ गैर-बंगाली कलाकारों द्वारा रवींद्र संगीत की प्रस्तुति दी जाती है, जो इस सांस्कृतिक मेलजोल और विरासत के विस्तार का एक सुंदर उदाहरण है।