NCERT की नई किताब: सिख गुरुओं पर मुगलों की क्रूरता का बड़ा खुलासा

NCERT की कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक (भाग 2) में सिख गुरुओं के खिलाफ मुगल राज्य की क्रूरता का विस्तृत विवरण दिया गया है। 'प्रतिरोध और लचीलापन (1000-1700 ईस्वी)' नामक अध्याय में उल्लेख किया गया है कि सिख गुरुओं के प्रति मुगलों का व्यवहार इतिहास के उन चुनिंदा उदाहरणों में से है जिसकी तुलना बहुत कम की जा सकती है। पुस्तक के अनुसार, यह क्रूरता केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि यह मुगलों की कठोर धार्मिक और भेदभावपूर्ण प्रथाओं में गहराई से निहित थी।
सिख गुरुओं का बलिदान और मुगलों की धार्मिक कट्टरता
पाठ्यपुस्तक में विशेष रूप से गुरु अर्जुन देव, गुरु तेग बहादुर और दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के प्रति मुगल राज्य की क्रूरता का वर्णन किया गया है। पुस्तक के अनुसार, धर्म के प्रति गुरुओं का साहस और बलिदान सिख धर्म की पहचान बन गया।
किताब में दिए गए विवरण के अनुसार:
- गुरु अर्जुन देव: पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जुन देव को मुगल सम्राट जहांगीर ने उनके विद्रोही पुत्र खुसरो मिर्जा को कथित समर्थन देने के बहाने मृत्युदंड देने का आदेश दिया था। इस शहादत को सिख इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया है।
- गुरु हरगोबिंद: छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद को जहांगीर द्वारा ग्वालियर किले में हिरासत में लिया गया था, जहाँ बड़ी संख्या में सिख उन्हें सम्मान देने पहुँचते थे।
- गुरु तेग बहादुर: नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर को 1675 में औरंगजेब ने मृत्युदंड दिया था। पाठ्यपुस्तक कहती है कि उनकी शहादत भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।
पुस्तक में यह भी कहा गया है कि 17वीं शताब्दी की शुरुआत से ही सिख गुरुओं के बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण मुगल राज्य उनके मामलों में हस्तक्षेप करने लगा था।
प्रतिरोध का उदय: मीरी-पीरी और अकाल तख्त
NCERT की यह किताब बताती है कि गुरुओं की शहादत ने सिखों के भीतर यह दृढ़ विश्वास पैदा किया कि उत्पीड़न का सामना दृढ़ प्रतिरोध और लचीलेपन के साथ किया जाना चाहिए। इस दबाव और उत्पीड़न का मुकाबला करने के लिए सामूहिक संगठन और आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र प्रतिरोध का मार्ग अपनाया गया।
पाठ्यपुस्तक में गुरु हरगोबिंद द्वारा लौकिक सत्ता के केंद्र के रूप में अकाल तख्त की स्थापना और 'मीरी-पीरी' की अवधारणा का भी उल्लेख किया गया है, जो आध्यात्मिक और सांसारिक सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।
मुगल शासन के खिलाफ जाट किसानों का विद्रोह
सिख प्रतिरोध के साथ-साथ, यह पाठ्यपुस्तक पहली बार गंगा-यमुना दोआब के जाट किसानों के मुगल साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष का भी विवरण देती है। पुस्तक के अनुसार, 17वीं शताब्दी के दौरान जाट समुदाय पर मुगलों द्वारा भारी कर और शोषण का बोझ डाला गया था।
मुगल शासन के तहत आर्थिक कठिनाइयों और औरंगजेब की धार्मिक नीतियों ने जाटों में गहरा असंतोष पैदा किया। इसके परिणामस्वरूप दो प्रमुख