नेहरू से मोदी तक: जानिए लोकतंत्र, विकास और भारत की इस लंबी राजनीतिक यात्रा का पूरा इतिहास

Akhand India Desk20 August 20264 min read2 viewsDharm
नेहरू से मोदी तक: जानिए लोकतंत्र, विकास और भारत की इस लंबी राजनीतिक यात्रा का पूरा इतिहास

स्वतंत्र भारत की यह यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह विचारों, संस्थाओं, संघर्षों, उपलब्धियों और निरंतर परिवर्तन की गाथा है। पिछले लगभग आठ दशकों में भारत ने लोकतंत्र को स्थापित किया, युद्धों का सामना किया, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति का अनुभव किया, आर्थिक उदारीकरण अपनाया, सूचना-प्रौद्योगिकी की वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा और आज डिजिटल अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक कूटनीति में अपनी नई पहचान बना रहा है। इन सबके बीच भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति में गहरे परिवर्तन हुए हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि नेहरू से मोदी तक भारत कितना बदला है? यह प्रश्न किसी व्यक्ति-विशेष के मूल्यांकन से अधिक भारत की बदलती दिशा, प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक विकास की पड़ताल का विषय है।

जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व और आधुनिक भारत की नींव

1947 में जब जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का नेतृत्व संभाला, तब देश विभाजन की त्रासदी, व्यापक गरीबी, निरक्षरता, औद्योगिक पिछड़ेपन और औपनिवेशिक शोषण की विरासत से जूझ रहा था। ऐसे समय में आधुनिक भारत के निर्माण का जो स्वप्न सामने रखा गया, उसकी आधारशिला लोकतांत्रिक संस्थाओं, संसदीय व्यवस्था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगीकरण, पंचवर्षीय योजनाओं, उच्च शिक्षा संस्थानों तथा धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था पर रखी गई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र, बड़े बाँध, इस्पात संयंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास उसी दौर की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं। यद्यपि इस मॉडल की सीमाएँ भी थीं। कृषि संकट, सामाजिक असमानता, जल-जंगल-जमीन से जुड़े प्रश्न, प्रशासनिक केंद्रीकरण और आर्थिक नियंत्रणवाद जैसे मुद्दे समय के साथ स्पष्ट होते गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल और नए दौर की विशेषताएँ

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विकास की एक भिन्न राजनीतिक और प्रशासनिक शैली देखी। डिजिटल शासन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधार-आधारित कल्याणकारी योजनाएँ, अवसंरचना निर्माण, राजमार्ग, रेलवे, बंदरगाह, डिजिटल भुगतान प्रणाली तथा वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय उपस्थिति इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ हैं। साथ ही सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थलों, सभ्यतागत पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया गया। विदेश नीति में भी भारत ने अधिक सक्रिय भूमिका निभाई और स्वयं को वैश्विक दक्षिण की एक प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। किन्तु किसी भी लोकतंत्र में उपलब्धियों के साथ चुनौतियों की चर्चा भी उतनी ही आवश्यक है। रोजगार सृजन, कृषि आय, शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक असमानता, संस्थागत स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बढ़ती आर्थिक विषमता और युवाओं की आकांक्षाएँ आज भी गंभीर बहस के विषय हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, विशेषकर पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के विश्वास को प्रभावित किया है। डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और स्क्रीन-आधारित जीवनशैली ने बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की विश्वसनीयता और अवसरों की समानता से मापी जाती है।

नेहरू और मोदी के बीच का कालखंड और विभिन्न राजनीतिक प्रयोग

नेहरू और मोदी के बीच का कालखंड भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इंदिरा गांधी का दौर, आपातकाल, जनता पार्टी का प्रयोग, मंडल और कमंडल की राजनीति, आर्थिक उदारीकरण, गठबंधन युग, सूचना क्रांति, क्षेत्रीय दलों का उदय और सामाजिक न्याय के आंदोलनों ने भारत के लोकतंत्र को नई दिशाएँ दीं। यही कारण है कि आधुनिक भारत को केवल दो व्यक्तित्वों के माध्यम से नहीं समझा जा सकता, यह अनेक विचारधाराओं, नेतृत्वों और सामाजिक आंदोलनों की साझा यात्रा है।

वर्तमान भारत के समक्ष चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

आज का भारत अनेक समानांतर विमर्शों से गुजर रहा है। राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्र-निर्माण, धार्मिक पहचान और बहुलतावाद, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगीकरण, तकनीकी प्रगति और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की चुनौती पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। राम मंदिर, जाति-आधारित राजनीति, दलित विमर्श, महिला अधिकार, शिक्षा सुधार, नई शिक्षा नीति, भारत-चीन संबंध, भारत-नेपाल संबंध, भारत-पाकिस्तान संबंध, जलवायु परिवर्तन, भ्रष्टाचार, चुनावी वित्तपोषण और डिजिटल लोकतंत्र जैसे विषय आने वाले भारत की दिशा तय करेंगे। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मालोचन की क्षमता है। प्रश्न पूछना, असहमति व्यक्त करना, तर्क करना और संवाद बनाए रखना लोकतांत्रिक संस्कृति के मूल तत्व हैं। किसी भी सरकार का मूल्यांकन न तो अंध-समर्थन से किया जा सकता है और न ही अंध-विरोध से। इतिहास हमें सिखाता है कि प्रत्येक युग अपनी उपलब्धियों और अपनी सीमाओं के साथ आता है। इसलिए आवश्यक है कि हम व्यक्तियों के बजाय नीतियों, परिणामों और संस्थाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन करें। नेहरू से मोदी तक की यात्रा वस्तुतः आधुनिक भारत के बदलते चरित्र की यात्रा है, जहाँ राष्ट्र-निर्माण के आदर्श, आर्थिक विकास की आकांक्षाएँ, सांस्कृतिक पुनर्परिभाषाएँ, लोकतांत्रिक संघर्ष और वैश्विक महत्वाकांक्षाएँ एक साथ दिखाई देती हैं। यह यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। इसका अगला अध्याय भारत का युवा लिखेगा, जिसकी अपेक्षाएँ रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक न्याय, तकनीकी नवाचार, पर्यावरणीय संतुलन और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ी हैं। इतिहास का उद्देश्य किसी एक युग को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्रक्रिया को समझना है। यदि हम अपने अतीत का ईमानदारी से मूल्यांकन करें, वर्तमान को विवेकपूर्ण दृष्टि से देखें और भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व का भाव रखें, तभी भारत की लोकतांत्रिक यात्रा और अधिक सशक्त, समावेशी और मानवीय बन सकेगी। यही इस विमर्श और हमारे लोकतंत्र का मूल संदेश है।

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