"नेहरू-गांधी परिवार ने हिंदुओं को माना दोयम दर्जे का": निशिकांत दुबे
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पार्टी पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। दुबे ने आरोप लगाया है कि नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा से हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना है और उन्हें प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है।
अपने सोशल मीडिया हैंडल 'X' पर "कांग्रेस का काला अध्याय" सीरीज के तहत एक पोस्ट साझा करते हुए, दुबे ने साल 1966 में हुए गौ हत्या विरोधी आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे साधुओं पर बर्बरतापूर्वक गोली चलवाई थी।
1966 का वो काला अध्याय: जब साधुओं पर चलीं गोलियां
निशिकांत दुबे के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया था। इसी क्रम में, फरवरी 1966 में महान संत करपात्री जी महाराज ने भारतीय जनसंघ के सांसद रामेश्वरानंद जी के साथ मिलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की थी।
दुबे ने आरोप लगाया कि मार्च 1966 में जब दोनों नेताओं ने तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा से भी मुलाकात की, तब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसका मुख्य कारण 1967 के आगामी चुनाव थे। दुबे का कहना है कि "कांग्रेस को गाय माता के मुद्दे में हिंदू-मुस्लिम विभाजन दिखाई दे रहा था, इसलिए इंदिरा गांधी ने प्रतिबंध लागू करने से इनकार कर दिया।"
सांसद ने 6-7 नवंबर 1966 की घटना का जिक्र करते हुए बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि संसद मार्ग पर स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हजारों साधु प्रदर्शन कर रहे थे, जिसके बाद प्रशासन ने हिंसक रुख अपनाया।
"इंदिरा गांधी ने निहत्थे साधुओं पर बर्बरता से गोली चलाने का आदेश दिया। सैकड़ों साधु मारे गए और उनकी लाशों को गायब कर दिया गया।"
इस घटना के बाद पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया और देश भर में धरना-प्रदर्शन और अनशन शुरू हो गए।
राजनीतिक दांव-पेच और 'चुप्पी' साधती कमेटी
दुबे ने आगे बताया कि इस अराजकता और हिंदू विरोधी मानसिकता को दबाने के लिए इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि स्थिति को संभालने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा को पद से हटा दिया गया और एक न्यायिक समिति का गठन किया गया।
इस समिति में कई महत्वपूर्ण हस्तियां शामिल थीं, जिनमें शामिल थे:
- अमल सरकार: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (समिति के अध्यक्ष)
- एम.एस. गोलवलकर: तत्कालीन आरएसएस सरसंघचालक
- पुरी के शंकराचार्य
- वर्गीज कुरियन: अमूल डेयरी के प्रमुख
हालांकि, निशिकांत दुबे का आरोप है कि इस समिति की न तो कोई बैठक हुई, न ही कोई कार्यालय बना और न ही कभी कोई रिपोर्ट पेश की गई। दुबे के अनुसार, यह सब केवल राजनीतिक हंगामे को शांत करने और कांग्रेस की छवि बचाने का एक तरीका था।