"काला पानी" की सजा मिले CEC को! कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत का चुनाव आयोग पर तीखा हमला

देश की चुनावी प्रक्रिया और निष्पक्षता को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए मांग की है कि उन्हें "काला पानी" की सजा दी जानी चाहिए। यह मांग SIR (Special Internal Review) से जुड़े विवाद के बीच आई है, जिसने देश के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
संविधान का उल्लंघन और 'काला पानी' की मांग
कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने ANI से बातचीत के दौरान बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार के पद की गरिमा और उनके कथित कदाचार की गंभीरता को देखते हुए उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
"अगर चुनाव आयोग किसी विशेष राजनीतिक दल या सरकार को खुला पक्षपात करके लाभ पहुँचाता है, तो यह सीधे तौर पर भारत के संविधान का उल्लंघन है। देश की शासन व्यवस्था चलाने वाली मशीनरी को निष्पक्ष होना चाहिए। ज्ञानेश कुमार के पद और उनकी जिम्मेदारी की गंभीरता को देखते हुए, मुझे लगता है कि उनके लिए 'काला पानी' ही उचित सजा है।"
भगत का कहना है कि चुनावी प्रणाली, जो पूरे राष्ट्र के शासन का आधार है, यदि पक्षपाती हो जाए तो यह लोकतंत्र के लिए घातक है।
क्या है SIR विवाद और 14 आपत्तियों का मामला?
यह पूरा विवाद तब गरमाया जब एक रिपोर्ट सामने आई कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान चुनावी रोल (electoral rolls) और डेटाबेस एक्सेस से जुड़ी प्रक्रियाओं और निर्णयों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी।
विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन महत्वपूर्ण आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। यह मामला अब गंभीर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है क्योंकि इसमें चुनावी डेटा और प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
JMM का हमला: "व्यक्तिगत सनक पर लिए गए निर्णय"
इस मामले में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने भी मोर्चा खोल दिया है। JMM प्रवक्ता मनोज पांडे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के व्यवहार को 'तानाशाही' करार दिया है।
पांडे के प्रमुख आरोप:
- सत्ता पक्ष को लाभ: पांडे ने आरोप लगाया कि CEC के आचरण से भाजपा को सीधा फायदा हुआ, जिससे दो से चार राज्यों में उनकी सरकारें बनाने में मदद मिली।
- तानाशाही रवैया: उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।
- पारदर्शिता का अभाव: आरोप है कि निर्णयों के लिए न तो कोई औपचारिक बैठक बुलाई गई, न ही कोई एजेंडा या मिनट्स तैयार किए गए। सब कुछ केवल व्यक्तिगत सनक पर आधारित प्रतीत होता है।
विपक्ष ने अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। मनोज पांडे ने सुझाव दिया है कि या तो किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में SIT बिठाई जाए या फिर एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन किया जाए, ताकि इस कथित मिलीभगत की सच्चाई सामने आ सके।