वंदे मातरम के 6 छंदों की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट में संग्राम: 'नक्सली' टिप्पणी पर भिड़े वकील और सॉलिसिटर जनरल!

Ghazala Saheb22 September 20263 min read2 viewsBihar
वंदे मातरम के 6 छंदों की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट में संग्राम: 'नक्सली' टिप्पणी पर भिड़े वकील और सॉलिसिटर जनरल!

सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी याचिका पर सुनवाई हुई जिसने कानूनी और राजनीतिक बहस को गरमा दिया है। मामला वंदे मातरम के सभी छह छंदों को सार्वजनिक समारोहों में गाना अनिवार्य करने के केंद्र सरकार के आदेश से जुड़ा है। इस मामले में कोर्ट के भीतर उस वक्त हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, जब सॉलिसिटर जनरल और याचिकाकर्ता के वकील के बीच तीखी नोकझोंक हो गई।

क्या है पूरा विवाद?

गायक टीएम कृष्णा ने केंद्र सरकार के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत सार्वजनिक सभाओं में वंदे मातरम के सभी छह छंदों को गाना अनिवार्य किया गया है। याचिका में न केवल इस अनिवार्यता पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि इस नए कानून के उल्लंघन पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई (criminal consequences) को भी चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि संशोधित कानून एक दंडात्मक कानून है। उन्होंने कहा कि जिस आचरण के लिए आपराधिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, उसे स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए और उसे अस्पष्ट नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

कोर्ट रूम में 'नक्सली' शब्द पर छिड़ा संग्राम

सुनवाई के दौरान माहौल तब तनावपूर्ण हो गया जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संवैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर बहस के दौरान "नक्सली" शब्द का इस्तेमाल किया। मुरलीधर ने इस टिप्पणी का कड़ा विरोध किया और तुरंत इसे वापस लेने की मांग की।

"अभी आपने जो शब्द इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह लाइव प्रसारित हो रहा है... मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूँ," मुरलीधर ने कहा।

हालांकि, सॉलिसिटर जनरल मेहता ने इस टिप्पणी को वापस लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने दोहराते हुए कहा, "मैंने कहा कि यह संवैधानिक तरीका है, न कि वह जो एक नक्सली चाहता है। और मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं है।" इस पर मुरलीधर ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि सोचना नक्सली होना नहीं है।

संवैधानिक अधिकारों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

बहस के बीच जस्टिस जोयमालया बागची ने हस्तक्षेप किया और व्यक्तिगत अधिकारों पर जोर दिया। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि "यहाँ तक कि एक व्यक्ति जिसे आतंकवादी होने का आरोपी माना जाता है, उसके पास भी संविधान के तहत अधिकार होते हैं।"

न्यायालय ने इस मामले में 'Conscientious Objector' (अंतरात्मा की आवाज पर चलने वाला व्यक्ति) के अधिकारों पर भी चर्चा की। कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे:

  • बिजो इमैनुएल मामले का हवाला: कोर्ट ने राष्ट्रगान से संबंधित 'बिजो इमैनुएल' मामले के फैसले का जिक्र किया, जो इस तरह के मामलों में मार्गदर्शक है।
  • आपराधिक कार्रवाई पर रोक: जस्टिस बागची ने संकेत दिया कि यदि कोई व्यक्ति अपने विश्वास के कारण वंदे मातरम के एक या सभी छंदों को गाने से इनकार करता है, तो उसे केवल इसी आधार पर आपराधिक मुकदमे का सामना नहीं करना चाहिए।
  • कानून का शासन: कोर्ट ने अपेक्षा की कि देश का कानून उसी दिशा में चलेगा जैसा कि पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर इस मामले पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। जवाब मिलने के बाद अदालत इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगी।

Share:

Comments

Leave a comment