महानंदा की लहरों से जंग: पेट पालने के लिए जान जोखिम में डालती हैं टुल्ली देवी
किशनगंज में टुल्ली देवी परिवार पालने के लिए जान जोखिम में डालकर महानंदा नदी पार करती हैं। अधूरा पुल ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है।

बिहार के किशनगंज जिले से गरीबी और सरकारी तंत्र की अनदेखी की एक बेहद मार्मिक तस्वीर सामने आई है। ठाकुरगंज प्रखंड के भंकरद्वारी गांव में रहने वाली टुल्ली देवी के लिए हर दिन का सूरज नई चुनौतियां और मौत का साया लेकर आता है। अपने चार सदस्यीय परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें हर दिन महानंदा नदी की उफनती लहरों से जूझना पड़ता है।
मौत को मात देकर रोटी की तलाश
टुल्ली देवी के पास रोजगार का कोई दूसरा साधन नहीं है। परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे पोठिया प्रखंड की ओर जाती हैं, जहां से वे लकड़ियां, घास और बांस इकट्ठा करती हैं। लेकिन असली चुनौती तब शुरू होती है जब उन्हें इन भारी सामानों के साथ वापस अपने गांव लौटना होता है।
करीब 700 मीटर चौड़ी महानंदा नदी के गहरे और तेज बहाव के बीच से गुजरना उनकी मजबूरी बन चुका है। सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर लादकर जब वे नदी के बीच पहुंचती हैं, तो एक छोटी सी चूक भी उनकी जान ले सकती है।
"डर तो लगता है, पर भूख बड़ी है"
जब उनसे नदी के गहरे पानी में उतरते समय लगने वाले डर के बारे में पूछा जाता है, तो उनके शब्द कलेजा चीर देते हैं। उन्होंने अपनी बेबसी बयां करते हुए कहा:
"अगर डरकर घर बैठ जाऊंगी, तो बच्चों का पेट कैसे भरेगा और घर में भात कैसे पकेगा?"
उनकी यह बात दर्शाती है कि कैसे गरीबी इंसान से उसके जीने का अधिकार और सुरक्षा दोनों छीन लेती है।
अधूरा पुल: ग्रामीणों के लिए बना बड़ी मुसीबत
टुल्ली देवी का यह संघर्ष केवल एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे भंकरद्वारी गांव की समस्या है। गांव के पास महानंदा नदी पर पुल न होने के कारण ग्रामीणों को आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- लंबा सफर: किशनगंज शहर और एमजीएम मेडिकल कॉलेज जाने के लिए ग्रामीणों को ठाकुरगंज या पौआखाली होकर जाना पड़ता है।
- दूरी का अंतर: वर्तमान में जिला मुख्यालय पहुंचने के लिए ग्रामीणों को लगभग 70 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है।
- पुल की स्थिति: ग्रामीणों का कहना है कि यदि पुल बन जाए, तो यह दूरी घटकर मात्र 15 किलोमीटर रह जाएगी।
ग्रामीणों ने बताया कि करीब तीन साल पहले महानंदा नदी पर पुल निर्माण का कार्य शुरू हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद ही यह काम अचानक ठप हो गया। पुल अधूरा होने के कारण आज भी लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों को अब केवल प्रशासन और संबंधित विभाग से यही उम्मीद है कि निर्माण कार्य को जल्द से जल्द दोबारा शुरू किया जाए ताकि उन्हें इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिल सके।