चावल के नए प्रोडक्ट्स से बढ़ेगी किसानों की कमाई, खुलेंगे ग्लोबल मार्केट के दरवाजे
भारत में चावल के वैल्यू-ऐडेड प्रोडक्ट्स जैसे लो-जीआई चावल और रेडी-टू-ईट फूड से किसानों की आय बढ़ सकती है और नए वैश्विक बाजार खुल सकते हैं।

नई दिल्ली में आयोजित भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (BIRC) 2026 में कृषि विशेषज्ञों ने एक महत्वपूर्ण बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि चावल के नए और उन्नत प्रोडक्ट्स के जरिए चावल से किसानों की कमाई को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। यदि भारत वैल्यू-ऐडेड (मूल्यवर्धित) उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश के लिए नए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार भी खुल जाएंगे।
साधारण चावल के मुकाबले मिलेगा मोटा मुनाफा
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को अब केवल थोक में चावल निर्यात करने के बजाय ऐसे उत्पादों पर ध्यान देना चाहिए जो अधिक कीमत दिला सकें। इससे कृषि मूल्य श्रृंखला (value chain) में अतिरिक्त राजस्व पैदा होगा।
- कीमतों में भारी अंतर: जहाँ पारंपरिक चावल के उत्पादों का मूल्य लगभग 350-500 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन होता है, वहीं विशेष प्रकार के लो-ग्लाइसेमिक-इंडेक्स (low-GI) चावल की कीमत ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में 2,000 अमेरिकी डॉलर से भी अधिक हो सकती है।
- नई किस्में: वैज्ञानिकों ने 'DRR धान 81' जैसी लो-जीआई चावल की किस्में विकसित की हैं, जो इस क्षेत्र में बड़ी क्रांति ला सकती हैं।
गुणवत्ता और पोषण के लिए ग्राहक देने को तैयार हैं प्रीमियम
मार्केटिंग विशेषज्ञों के अनुसार, आज के उपभोक्ता बेहतर गुणवत्ता, पोषण और पारदर्शिता (traceability) के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार हैं।
"ग्राहक वहां प्रीमियम देने को तैयार हैं जहां उत्पाद में स्पष्ट अंतर और बेहतर गुणवत्ता दिखाई देती है।"
उदाहरण के तौर पर, सामान्य रूप से उत्पादित मट्टा चावल जहाँ लगभग 60 रुपये प्रति किलो बिकता है, वहीं एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) जैसी उन्नत तकनीकों से तैयार चावल 100 रुपये प्रति किलो तक बिक सकता है।
कचरे से कंचन: पराली से भी होगी अतिरिक्त कमाई
किसानों के लिए आय का एक नया स्रोत चावल का अवशेष भी बन सकता है। विशेषज्ञों ने बताया कि चावल के भूसे, छिलके और चोकर का उपयोग करके अतिरिक्त लाभ कमाया जा सकता है:
- ईंधन का विकल्प: कृषि अवशेषों को ईंधन ब्रिकेट्स में बदलकर किसानों को एक किफायती विकल्प मिल सकता है।
- प्रदूषण में कमी: इस प्रक्रिया से फसल अवशेष (पराली) जलाने की समस्या में भी कमी आएगी।
रेडी-टू-ईट और नए उत्पादों की संभावनाएं
बाजार में रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक चावल उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जो सुविधा और क्षेत्रीय स्वाद का मिश्रण प्रदान करते हैं। इसके अलावा, स्थानीय भारतीय चावल की किस्मों का उपयोग करके प्रीमियम फर्मेंटेड पेय (जैसे साके) बनाने की भी अपार संभावनाएं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अनुसंधान संस्थानों, किसानों और निजी कंपनियों के बीच मजबूत तालमेल और प्रसंस्करण (processing) व ब्रांडिंग में निवेश की आवश्यकता है।